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Dharmkshetra | धर्मक्षेत्र
जीवच्छ्रधापद्धति
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सोलह भारतीय संस्कारों में अंतिम मरणोपरांत संस्कार श्राद्धकर्म का विशेष महत्व है। इसके बिना जीव की समुचित गति नहीं होती। यद्यपि यह संस्कार पुत्र द्वारा किया जाता है, किन्तु आज के असंयम के वातावरण में पले-बढ़े कुछ पुत्र-पौत्र अपने माता-पिता का मरणोपरांत संस्कार ठीक से नहीं करते। जो पुत्र नहीं है, वह अलग बात है। प्रस्तुत पुस्तक में जीवित श्राद्ध की शास्त्रीय व्यवस्था दी गई है, जिसके माध्यम से व्यक्ति जीवित रहते हुए ही सही मरणोपरांत संस्कार करके कर्म बंधन से मुक्त हो सकता है।
- श्राद्धकर्म का महत्व:
- सोलह भारतीय संस्कारों में से अंतिम मरणोपरांत संस्कार
- जीव की समुचित गति के लिए आवश्यक
- वर्तमान अभ्यास मुद्दे:
- कुछ बेटे - पोते आज के परिवेश में अविश्वास के कारण संस्कार ठीक से नहीं करते
- जो बेटे नहीं हैं उनके लिए अलग विचार
- पुस्तक सामग्री:
- श्राद्ध की शास्त्रीय प्रणाली का विवरण
- यह बताया गया है कि किस प्रकार मरणोपरांत सही संस्कार करने से व्यक्ति को जीवित रहते हुए कर्म के बंधन से मुक्त होने में मदद मिल सकती है

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