हमारा उद्देश्य
धर्मक्षेत्र का उद्देश्य भारतीय संस्कृति एवं साहित्य को वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य के अनुरूप सर्व ग्राह्य और सुलभ बनाना एवं सनातन संस्कृति में रुचि रखने वाले बंधुओं/भगिनियों को आवश्यक सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
सनातन का आधार वेद/उपनिषद हैं, और वेदों का आधार ज्ञान विज्ञान है। हमारा प्रयास है कि हमारे दर्शन और उपनिषदों के वैज्ञानिक तथ्यों को आम जन मानस तक साधारण भाषा और डिजाइन के माध्यम से प्रेषित करें।
हमारे ऐतिहासिक ग्रंथ रामायण और महाभारत में पुरुषोत्तम की लीला वर्णन में उनकी नेतृत्व शैली का विस्तार से वर्णन किया गया है। हम उन नेतृत्व के लक्षणों को अपने उत्पादों द्वारा परिलक्षित करने का प्रयास करते हैं जिससे उनको आचरण में धारण कर हम अधिक से अधिक उन्नति कर सकें।
रामचरितमानस में मारीच वध प्रसंग में जब माता सीता मारीच की करुण पुकार से आशंकित होकर लक्ष्मण जी को प्रभु की सहायता को जाने का आग्रह करती हैं तब लक्ष्मण जी हंसते हुए कहते हैं:
भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुॅ संकट परइ कि सोई॥
वस्तुत: प्रभु की मानव लीला का एकमात्र उद्देश्य आम जन को सनातन जीवन दर्शन का पुरुषोत्तम स्वरूप उजागर करना है। ऐसा आचरण जिसको धारण करने से मनुष्य की ब्रह्म को जानने की यात्रा सहज हो जाती है।
कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन युद्ध क्षेत्र में व्याकुल होकर श्री कृष्ण से शरणागति की प्रार्थना करते हैं तब भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन के माध्यम से नेतृत्व के सनातन लक्षणों का विस्तृत वर्णन करते हैं।
ऐसा ज्ञान जो मानव को उसकी सम्पूर्ण सामर्थ्य का बोध कराकर अनंत संभावनाओं के मार्ग को प्रशस्त करता है एवं ईश्वर की सर्वोत्तम कृति का सर्वोत्तम संस्करण उजागर करने हेतु समुचित साधन देता है।
आइए हम अपने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक साहित्य से प्रेरणा लेकर एक ऐसे समाज की रचना में उद्यत हों जिसका आधार एवं आचार विचार पुरुषोत्तम से प्रेरित हों।
सिय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
हमारा उद्देश्य
धर्मक्षेत्र का उद्देश्य भारतीय संस्कृति एवं साहित्य को वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य के अनुरूप सर्व ग्राह्य और सुलभ बनाना एवं सनातन संस्कृति में रुचि रखने वाले बंधुओं/भगिनियों को आवश्यक सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
सनातन का आधार वेद/उपनिषद हैं, और वेदों का आधार ज्ञान विज्ञान है। हमारा प्रयास है कि हमारे दर्शन और उपनिषदों के वैज्ञानिक तथ्यों को आम जन मानस तक साधारण भाषा और डिजाइन के माध्यम से प्रेषित करें।
हमारे ऐतिहासिक ग्रंथ रामायण और महाभारत में पुरुषोत्तम की लीला वर्णन में उनकी नेतृत्व शैली का विस्तार से वर्णन किया गया है। हम उन नेतृत्व के लक्षणों को अपने उत्पादों द्वारा परिलक्षित करने का प्रयास करते हैं जिससे उनको आचरण में धारण कर हम अधिक से अधिक उन्नति कर सकें।
रामचरितमानस में मारीच वध प्रसंग में जब माता सीता मारीच की करुण पुकार से आशंकित होकर लक्ष्मण जी को प्रभु की सहायता को जाने का आग्रह करती हैं तब लक्ष्मण जी हंसते हुए कहते हैं:
भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुॅ संकट परइ कि सोई॥
वस्तुत: प्रभु की मानव लीला का एकमात्र उद्देश्य आम जन को सनातन जीवन दर्शन का पुरुषोत्तम स्वरूप उजागर करना है। ऐसा आचरण जिसको धारण करने से मनुष्य की ब्रह्म को जानने की यात्रा सहज हो जाती है।
कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन युद्ध क्षेत्र में व्याकुल होकर श्री कृष्ण से शरणागति की प्रार्थना करते हैं तब भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन के माध्यम से नेतृत्व के सनातन लक्षणों का विस्तृत वर्णन करते हैं।
ऐसा ज्ञान जो मानव को उसकी सम्पूर्ण सामर्थ्य का बोध कराकर अनंत संभावनाओं के मार्ग को प्रशस्त करता है एवं ईश्वर की सर्वोत्तम कृति का सर्वोत्तम संस्करण उजागर करने हेतु समुचित साधन देता है।
आइए हम अपने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक साहित्य से प्रेरणा लेकर एक ऐसे समाज की रचना में उद्यत हों जिसका आधार एवं आचार विचार पुरुषोत्तम से प्रेरित हों।
सिय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥